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2 नव॰ 2012

कार वाला बाबू


वह कार से चलता है,
सारा मुहल्ला ज़लता है।

पड़ोस के बनिए के यहाँ से चावल हो लाना,
या सब्जी लेने बाज़ार हो जाना,
पैदल चलने वालों को समझता है हीन,
चाबी घुमाओ और निकल दो एक दो तीन।

पर उनका क्या जो कार से नहीं चलते,
साईकिल पर या पैदल हैं निकलते।
कंजूस है सारे या फिर हैं गरीब ,
ये कहता फूटे हैं उनके नसीब।

हाँ उनके नसीब तो फूटे ही हैं,
कार से भी नहीं चलते,
फिर भी पर्यावरण का विष पीते हैं,
दमा, खाँसी आँखों में जलन झेल के जीते हैं।

धुआ नहीं छोड़ते फिर भी कष्ट झेलते हैं जीने में,
झेलते हैं जेठ की गर्मी माघ पूस के महीने में।

कार वाला तो एसी भी चला लेता है,
ये गरीब क्या करे दिन मे दो तीन बार नहा लेता है।

नहा लेता है पास की नदी मे, नहीं-नहीं नाले में,
नाला ही तो है वह, काला दिखता है दिन के उज़ाले में।

कभी नदी हुआ करता था,
चमचम करता किलकारियाँ भरता था,

अब पड़ोस के कारखाने का कचरा वहन करता है,
जिसमें बाबुओं के लिए शीतल पेय बनता है।

कार वाला गरीबों को देख कर नाक भौह सिकोड़ता है,
अपने ऐशोआराम के लिए उनके हवा पानी में ज़हर घोलता है।

कार वाले बाबू को कब आएगी अकल,
कब पड़ोस से सब्जी लाने गर्व से जाएगा पैदल।


9 मार्च 2010

रोको उस दानव को

बिना सोचे कुल्हाड़ी चला टुकड़े कर देते हैं वृक्ष के शरीर के,
क्यूँ नहीं सोचते कितनी मेहनत से उगा होगा वह पौधा धरती का सीना चीर के।

क्यूँ सोंचते नहीं उसका बीज कैसे वहाँ पर आया होगा,
किसी पक्षी कि मेहरबानी होगी या किसी बूढे ने लगाया होगा।

उसके साथ होंगे कुछ और बीज जो देख नहीं पाए होंगे दुनिया की बहार,
वहीं पड़े सड़ गए होंगे या बन गए होंगे कीड़ों का आहार।

वह एक बीज जो प्रतिकूल परिस्थितियाँ सह पाया,
तूफानों में, बरसातों में अडिग खड़ा जो रह पाया।

उभरा है कितनी आफतों से खेल कर,
बाढ़ को, सूखे को हँसते रोते झेल कर।

किया है कई बार जानवरों ने नोंच-नोंच कर लहूलुहान,
चुप-चाप सह गया इसको अपनी किस्मत जान।






बड़ा हुआ प्रदूषण का विष पी-पी कर,
देता रहा प्राण वायु हमें खुद जैसे तैसे जी कर।

थके पथिकों को दी छाया, पक्षियों ने पाया आराम इस पर,

कुछ पक्षियों ने, कुछ जीवों ने इसे बना लिया अपना घर।

उन पक्षियों, उन जीवों की कई पुश्तों को ये जानता है,
शायद उनको भी ये अपनी संतान मानता है।

कुछ वार और, और इसकी इहलीला समाप्त हो जायेगी,
कोई रोको उस दानव को वरना ये विरासत खो जायेगी।

फिर शाम को पक्षियों को कौन बुलाएगा देने को आराम,
लालच मे मत भूलो कि क्या होगा अंज़ाम।

जब हरियाली नहीं होगी, बादल भी नहीं बरसेंगे,

सर्वनाश हो जाएगा, हम अन्न-अन्न को तरसेंगे।

सर्वनाश हो जाएगा, हम अन्न-अन्न को तरसेंगे......

प्रकाशित: लेखापरीक्षा-प्रकाश अप्रेल-जून 2008

3 दिस॰ 2009

वह दानव हममें बसता है

जीवन मे प्रगति की अन्धी दौड़ में,
सफलता नाम पैसे की होड़ में,
कुछ है जो चुभता है, जलता है,
सबकुछ ठीक है, मगर फिर भी कुछ खलता है.

अभी यहाँ पर यह जो अट्टालिका खड़ी है सीना तान,
वहाँ पर एक पेड़ था कभी जिस पर कोयल सुनाती थी तान.

आस पास रेंगते हैं काले धुएँ के गुब्बार,
कभी यहाँ बहती थी महकती मदमाती बसंत बयार.

और वो जो बह रहा है पीछे बड़ा सा नाला,
बदसूरत बदबुदार और कोयले से भी काला

कभी वहाँ निर्मल नदिया कलकल करती बहती थी.
आओ मिल कर होड़ लगाएँ राहगीरों से कहती थी.

अब तो उसकी गति पड़ गई है मन्द
गन्दगी और कचरे ने उसकी सांसे कर दी है बन्द.

और थोड़ी दूर वो जो नंगा सा पहाड़ घूर रहा है,
अपने ज़माने में वो भी खुबसूरती के लिए मशहूर रहा है.

इस अंतहीन सड़क पर जहाँ से ज़हर छोड़ती धूल धूसरित गाड़ियाँ रेंग रही हैं,
कभी वहाँ छ्लांगे भरते थे शावक आज ढूँढा तो पाया वो कहीं नहीं हैं.

किसने तोड़ा उन घोसलों को, पक्षियों ने कितनी मेहनत से बनाया होगा,
किसने मारा उन जीवों को, मारने के पहले कितना तड़पाया होगा.

नदिया जो वहती थी चुपचाप,
जाने किस दानव का उसको लग गया श्राप.

झाँको, अपने भीतर देखो,
वो दानव हममें बसता है,
अपना जीवन पाया जिस प्रकृति से,
उसका हीं गला घोंटता है और हँसता है.

प्रकृति का गला घोंट के
उसके प्रति हम अपना प्रेम कुछ इस तरह दिखाते हैं,
कुछ कुत्ते बिल्ली पाल कर,
गमलों मे दो चार पौधे लगाते हैं.

उन पौधों को भी रास नहीं आता,
मानव का ज़हरीला वातावरण
मुर्झाए हुए से मुस्काते हैं
ओढ़ कर धूल धूएँ का आवरण

प्रकाशित: सुबह, जनवरी-मार्च 2007

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