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30 नव॰ 2012

खोया हीरा

एक हीरा था जिसको शीशा समझ खो दिया अनजाने में,
तड़पता हूँ, तरसता हूँ, ढूँढ़ता रहता हूँ हर जगह वीराने में।


कभी बेबात मुस्कुरा कर , कभी मिठी बातों की बौछारों से,
वो हरदम कुछ कहना चाहती थी, कभी फूलों से, कभी उपहारों से।

वो बाँसूरी थी जिसकी वाणी कानों मे मिश्री घोलती थी,
ना समझ सका गहरी आँखें तब क्या मुझसे बोलती थीं।

वह कस्तूरी तो पास ही थी जिसको तकता था दूर तलक,
तब आँखों पर परदा छाया था, अब तरसूँ पाने को एक झलक।

उस समुद्र को रख सके, इतना बड़ा मेरा दिल ना था,
वो स्वर्ण परी थी, ये नाचीज़ ही उसके काबिल ना था।

फूल से दिल को कुचलने की शायद यही सज़ा मुकर्रर है,
वीराने में भटकना, अपना सर पटकना, अब यही मेरा मुकद्दर है।

13 जुल॰ 2011

आँसू है कि पानी है


इस बार अपनी एक पुरानी रचना जो कि मैंने 28 जून 2004 को लिखी थी। 

सावन में इन आँखों से कुछ ऐसे मोती भी बरसते हैं,
जो उनकी याद में गिरते हैं, जिन से हम मिलने को तरसते हैं,

बादलों के गर्जन में एक आह दब कर रह जाती है,
जब उनसे मिलने की चाहत दिल में इक टीस जगाती है,

अम्बर जब बरस-बरस कर तपती धरती की प्यास बुझाता है,
मुझको भी बार-बार मेरा साक़ी याद आता है
 
काली, लम्बी रातों में जब बिजली से डर छुपता है अन्धेरा दो पल को,
चाहत उठती है, बस दो पल ही सही, वो आएँ, सफल कर जाएं जीवन को।

मेंढक भी जब फुदक-फुदक कर अपने मीत बुलाते हैं
लगता है, हमसे ये मेंढक ही भले, दिल खोल इश्क फ़रमाते हैं ।

भीग रहें हैं पेड़ पौधे, छा गई उन पर भी जवानी है,
भीगे हैं हम जिससे, पता नहीं आँसू है कि पानी है। 

22 नव॰ 2010

कोई अपना होता


इस अनजाने शहर में,
काश कोई अपना मिल जाता,
जिसे हम अपने मन की सुनाते,
जो अपने दिल की बताता.

साथ चलता कोई
इन अनजाने गलियारों में,
भर देता सुखद अर्थ कोई
इन बेअर्थ बहारों में.

कोई होता ऐसा कन्धा,
जिस पर जब अपना सर रख देता,
वो सुख भर देता जीवन में,
सारी पीड़ा हर लेता.

अब तक तो मेरा साथी है,
बस मेरा अकेलापन, जो साथ नहीं छोड़ता,
शहर के गलियारों में, महफ़िल में, तन्हाई में,
मुझसे मुँह नहीं मोड़ता.

प्रकाशित: सुबह

4 जून 2010

तेरी यादें

दिल से तेरी यादें जाती नहीं,
दिल के किस कोने में है उनका आशियाँ?

मैं भूलने कि कोशिश चाहे लाख करूँ,
तेरी यादें साथ जाती हैं, जाता हूँ जहाँ।

ज़िन्दा लाश बना कर छोड़ दिया
इतना तो बता दे मुंसिब मेरा गुनाह क्या?

तु ही तो बस मेरी अपनी थी,
तेरा दिया दर्द किससे करूँ बयाँ?

यूँ अन्धेरे में जो खो जाना था,
क्यूँ थामा था हाथ मेरा इतनी दूर तलक?

ज़माना बीत गया तेरे दीदार को फिर भी,
नाम तेरा लेकर गिरती उठती है क्यूँ पलक?

जान ले ले जुदाई इससे पहले,
बस एक झलक दिखा जा ऐ बेरहम।


वरना तुझको हीं ढूंढेंगे,
अगले कई युगों तक हर जनम ।

वरना तुझको हीं ढूंढेंगे,
अगले कई युगों तक हर जनम ......

प्रकाशित: सुबह – संयुक्तांक – 2008

29 दिस॰ 2009

रुठ गई नींद


नींद भी रुठ गयी है, तेरा साथ छोड़ के जाने के बाद

काश आज चैन की नींद आ जाए फिर, ज़माने के बाद.


तेरा चेहरा कुछ ऐसे घुमता है आंखो मे, बेचैनी बढ़ जाती है,

फिर दिल सिसक सिसक कर रोता है, फिर नींद किसे आती है.


तेरी गोद का सुकून ढुंढ्ते, रात बीतती है करवटें बदलते बदलते

भोर कब होती है, पता नहीं चलता तेरी याद में जलते जलते.


दिल माँगता है दुआएँ, काश वो दिन वापस आ जाते

ठंडक होती तेरे चुनर की, हम चैन की नींद सो पाते.


अब तो उम्मीद खो चुका हूँ, लगता है वो दिन वापस नहीं आएँगे,

मौत का इंतजार है अब बस, जब हम चैन की नींद सो पाएँगे.


अगली बार सोने से पहले बस इतनी दुआ करना,

मौत माँग लेना मेरे लिए, बस इतनी वफा करना.

मौत माँग लेना मेरे लिए, बस इतनी वफा करना...

प्रकाशित: सुबह, जनवरी-मार्च 2008.

10 सित॰ 2009

पतझड़ में जीवन बीत गया

तू जो मिलि न मुझको इसमें तुझको कोई इल्ज़ाम नहीं,
ढूंढा तो पाया हाथ की लकीरों में कहीं भी तेरा कोई नाम नहीं।

हाँ एक लकीर है ज़रूर, तुझपे फिदा हो जाने की,
तुझसे मिलने से पहले तुझसे ज़ुदा हो जाने की।

कोई हमसफ़र न मिला हमको तन्हा ये सफ़र यूँ बीत गया,
वसंत की सुबह न देखी पतझड़ में जीवन बीत गया

कभी अपना न बना सके उनको हम जिनके दीवाने थे,
वो दिल में बसते थे हमारे पर हमसे अनजाने थे।



दिल में तस्वीर है उनकी अब भी पर बहूत दूर मनमीत गया ,
वसंत की सुबह न देखि पतझड़ में जीवन बीत गया।



कभी तो पिघलेंगे ग़म के बदल खुशियाँ बरसेंगी जीवन में,
हरियाली छायेगी सुखी बगिया में यह आस लगी थी मन में।



अब तो पथरा गयी हैं आँखें भी अकेलापन हमसे जीत गया,
वसंत की सुबह न देखी पतझड़ में जीवन बीत गया।



हिन्दी पत्रिका सरिता जून २००४ अंक में प्रकाशित।
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