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2 नव॰ 2012
कार वाला बाबू
9 मार्च 2010
रोको उस दानव को
क्यूँ नहीं सोचते कितनी मेहनत से उगा होगा वह पौधा धरती का सीना चीर के।

उसके साथ होंगे कुछ और बीज जो देख नहीं पाए होंगे दुनिया की बहार,
वहीं पड़े सड़ गए होंगे या बन गए होंगे कीड़ों का आहार।
वह एक बीज जो प्रतिकूल परिस्थितियाँ सह पाया,
तूफानों में, बरसातों में अडिग खड़ा जो रह पाया।
उभरा है कितनी आफतों से खेल कर,
बाढ़ को, सूखे को हँसते रोते झेल कर।
किया है कई बार जानवरों ने नोंच-नोंच कर लहूलुहान,
चुप-चाप सह गया इसको अपनी किस्मत जान।

बड़ा हुआ प्रदूषण का विष पी-पी कर,
देता रहा प्राण वायु हमें खुद जैसे तैसे जी कर।
थके पथिकों को दी छाया, पक्षियों ने पाया आराम इस पर,
कुछ पक्षियों ने, कुछ जीवों ने इसे बना लिया अपना घर। उन पक्षियों, उन जीवों की कई पुश्तों को ये जानता है,
शायद उनको भी ये अपनी संतान मानता है।
कुछ वार और, और इसकी इहलीला समाप्त हो जायेगी,
कोई रोको उस दानव को वरना ये विरासत खो जायेगी।
फिर शाम को पक्षियों को कौन बुलाएगा देने को आराम,
लालच मे मत भूलो कि क्या होगा अंज़ाम।
जब हरियाली नहीं होगी, बादल भी नहीं बरसेंगे,
सर्वनाश हो जाएगा, हम अन्न-अन्न को तरसेंगे। सर्वनाश हो जाएगा, हम अन्न-अन्न को तरसेंगे......
प्रकाशित: लेखापरीक्षा-प्रकाश अप्रेल-जून 2008
3 दिस॰ 2009
वह दानव हममें बसता है

अभी यहाँ पर यह जो अट्टालिका खड़ी है सीना तान,
वहाँ पर एक पेड़ था कभी जिस पर कोयल सुनाती थी तान.
आस पास रेंगते हैं काले धुएँ के गुब्बार,
कभी यहाँ बहती थी महकती मदमाती बसंत बयार.
और वो जो बह रहा है पीछे बड़ा सा नाला,
बदसूरत बदबुदार और कोयले से भी काला

कभी वहाँ निर्मल नदिया कलकल करती बहती थी.
आओ मिल कर होड़ लगाएँ राहगीरों से कहती थी.
अब तो उसकी गति पड़ गई है मन्द
गन्दगी और कचरे ने उसकी सांसे कर दी है बन्द.
और थोड़ी दूर वो जो नंगा सा पहाड़ घूर रहा है,
अपने ज़माने में वो भी खुबसूरती के लिए मशहूर रहा है.
इस अंतहीन सड़क पर जहाँ से ज़हर छोड़ती धूल धूसरित गाड़ियाँ रेंग रही हैं,
कभी वहाँ छ्लांगे भरते थे शावक आज ढूँढा तो पाया वो कहीं नहीं हैं.

किसने तोड़ा उन घोसलों को, पक्षियों ने कितनी मेहनत से बनाया होगा,
किसने मारा उन जीवों को, मारने के पहले कितना तड़पाया होगा.
नदिया जो वहती थी चुपचाप,
जाने किस दानव का उसको लग गया श्राप.
झाँको, अपने भीतर देखो,प्रकृति का गला घोंट के
उसके प्रति हम अपना प्रेम कुछ इस तरह दिखाते हैं,
कुछ कुत्ते बिल्ली पाल कर,
गमलों मे दो चार पौधे लगाते हैं.
उन पौधों को भी रास नहीं आता,
मानव का ज़हरीला वातावरण
मुर्झाए हुए से मुस्काते हैं
ओढ़ कर धूल धूएँ का आवरण
प्रकाशित: सुबह, जनवरी-मार्च 2007