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9 अग॰ 2011

Journey to Jaipur with Kids as Co-passengers


What a style.


लंगोटिया यार

मास्टर जी Tension Me
Model in the making

पढ़ाकू लड़के
सीधी बच्ची
मुँह में खिड़की
पक्की सहेलियाँ






This was just another official trip to Jaipur. Unlike my colleagues in the field offices, who are regularly on trip to one station or the other in their respective states, being at CAG HQs, I have comparatively eventless life without many trips. This was my second trip in a row after trip to Ranchi. Having woken up at 3:30 in the morning to catch the 06:05 Ajmer Shatabdi, I was feeling asleep and was almost in the other world when sudden laughter and shouting of some 50 odd 5-6 year olds woke me up, I knew this journey is going to be somewhat special, other than many others that I have undertaken. I found the experience too tempting to add one post on this to my blog.
Soon after they were on their seats, jumping and fighting started.  Tea kit was served to all. I saw one girl making tea with the cold Rail Neer mineral water that had just been served. Her friend mocked at her and called out for “ Miss” saying “मिस-मिस देखिए इसने क्या किया?”.  While some were looking at tea kit with wonder, some tore it apart to find their favorite stuff: the dairy whitener. I still remember the golden childhood days when the dairy whitener meant for emergency situations to serve tea to guests could not last longer due to the three mischievous two legged rodents of the home.   
Isn’t it unfair to offer children with something they should not be having at this age? Why doesn’t the Railways provide for some other healthy alternative for the children?
Two boys were busy in the usual डिशूम-डिशूम until the teacher intervened. After a while I wanted to use the washroom. I was about to enter when I was stopped by one of the teachers that, children are waiting in line, please let them use it first. OK, I knew this line would not end till I could wait, so I took the wise decision to use the lavatory of the other compartment.
In such a huge group of 50 children, you usually find children of all sorts, not so troubling, shy and speechless variety, children whose voice box seems to have been made specially at the Bosch Sound System’s factor, children who are born mountaineers, trying to ride the chairs in the Chair Car compartment, children who were asking for ‘lunch’ right from the moment  they boarded the train (“मैडम आपने तो कहा था कि लंच मिलेगी? कब मिलेगी ?) My seat was right behind their last row. After watching them for almost an hour, I could not resist asking their teacher “ Would you mind if I take photographs of your students?” He permitted me with a smile. I have posted the best of the photographs and some videos that I took. Though I wanted to take photographs of them doing their usual stuff without being conscious of being videographed/photographed, the moment I took the camera to them, they all started being good guys giving nice poses, some of which were really worth applause.
The attendants on trains are found to be serving usually with expressionless long drawn faces. They were found smiling all along. The TTE told me “कान खा गए। इन्हें तो बस लेडिज़ ही संभाल सकती है। ऐसे ही थोड़े ही न कहती हैं, एक दिन सम्भाल के देखो तो समझ में आ जाएगा ।“ co-passengers could not resist a laugh.
Though I was sleep deprived, I could not complain as they had made my journey memorable. 

13 जुल॰ 2011

आँसू है कि पानी है


इस बार अपनी एक पुरानी रचना जो कि मैंने 28 जून 2004 को लिखी थी। 

सावन में इन आँखों से कुछ ऐसे मोती भी बरसते हैं,
जो उनकी याद में गिरते हैं, जिन से हम मिलने को तरसते हैं,

बादलों के गर्जन में एक आह दब कर रह जाती है,
जब उनसे मिलने की चाहत दिल में इक टीस जगाती है,

अम्बर जब बरस-बरस कर तपती धरती की प्यास बुझाता है,
मुझको भी बार-बार मेरा साक़ी याद आता है
 
काली, लम्बी रातों में जब बिजली से डर छुपता है अन्धेरा दो पल को,
चाहत उठती है, बस दो पल ही सही, वो आएँ, सफल कर जाएं जीवन को।

मेंढक भी जब फुदक-फुदक कर अपने मीत बुलाते हैं
लगता है, हमसे ये मेंढक ही भले, दिल खोल इश्क फ़रमाते हैं ।

भीग रहें हैं पेड़ पौधे, छा गई उन पर भी जवानी है,
भीगे हैं हम जिससे, पता नहीं आँसू है कि पानी है। 

16 जून 2011

चौकन्ने रहो


पग पग में है ज़ाल बिछा, ख़तरों से भरी है डगर,
कोइ बहेलिया है इंतज़ार में , सुबह शाम दोपहर।

पीछे खंजर है उनके, जिनके मुँह में मिठी बात है,
बस खिलौने हैं इनके लिए ये जो तुम्हारे ज़ज्बात हैं।

छीन लेंगे आज़ादी, काट कर तुम्हारे पर,
ज्यादा शोर मचाओगे तो कर देंगे अन्दर।

घर में बाज़ार में, हर जगह खतरा ही खतरा है,
तुम्हारी ज़ेब के पीछे लगा हर जगह एक जेबकतरा है।

हर मुस्काते चेहरे के पीछे लालची निग़ाहे हैं,
काँटे छुपे हुए हैं उनमें, हरी भरी जो राहें है।

धन हवस के पुजारी ये, हैवानियत के फ़रिश्ते हैं,
बेमानी हर धर्म इनके लिए, बेमानी हर रिश्ते हैं।




ऐ मासुम कल को लुट ना जाए कही तुम्हारा भोलापन,
 भूल कर भी कभी ना खोना, अपना चौकन्नापन।

11 मई 2011

आओ यादों की लहरों में गोते लगाएँ

Father Jose Muthupalakal
  a Synonym for
Discipline, Dedication, Secularism and  

Indian Values.
इससे पहले कि मन के आईने पर, यादों की छवि धुन्धली पड़ जाए;
या फिर उन Great Times की तस्वीरें, आलमारी के सीलन से सड़ जाएँ।

मन हीं मन हजारों गालियाँ दीं थी फादर जोश को,
बीत ना जाए उनके लिए माफी माँगने का अवसर;


या फिर उस दोस्त को बताने का मौका,
जिसकी Tiffin चुरा कर खा जाते थे अक्सर।

दयानन्द सर का Children’s Day पर गाया गया वो पुराना गाना,  
( R D Burman का माँझी वाला)
या फिर Teacher से हमारी शिकायत करने वाला वो दुश्मन पुराना।


अरूण सर के Chemistry Equations की टेढ़ी  पहेली,
या फिर सबसे कट कर रहने वाली वह लड़की अकेली।

विनोद सर के संस्कृत के शब्द रूपों की माला,
या फिर मिस मरियम की कक्षा में पढाए गए दिनकर, निराला।


इन्द्रभूषण सर का बताया हुआ Cell Division,
या सन्दीप सर का बताया छुपी बेरोज़गारी का Definition|

संजय सर की Library में पढे गए किताबों की गिनती,

या फिर मामा की शादी में जाने देने के लिए फादर से की गई विनति,

आओ कैद कर लें उन यादों को इस WA Group के सहारे,
यादों की लहरों में गोते लगाएँ, बैठे ना रहें किनारे।

कि जब भी मन हो भारी,
या छाने लगे सफलता और पैसे की ख़ुमारी,

याद कर लें Fr. Jose की पिटाई,(अभी भी सपनों में पिट्ता हूँ)
और बाँट कर खाई गई Tiffin Box की मिठाई,

और कर लें हिसाब कितना जमा है यादों के बचत खातों में,

जिसे पढ़ कर सूकून की नींद आ जाए परेशानी भरी रातों में।

दिखा सकें अपने जीवन साथी को अपने पहले Innocent Crush की तस्वीर
(Very rare to find a creanite of Fr. Jose’s times to have a crush on someone.)
जो कभी बैठते थे एक Table पर आज कहाँ ले गई उनको तकदीर 

बचपन में जनसंख्या पर भाषण देने वाले सहपाठी के है कितने बच्चे 
(Just Joking, तुकबन्दी only),
या फिर Slam Book में दोस्तों के किए वादे हैं कितने सच्चे 
(Will always be in touch, etc etc)।


दिखा सकें अपने बच्चों को कि हमारा कैसा स्कूल था,
और उसमे पढ़ने वाला तेरा बाप कितना नामाकूल था।

जब ढ़ूढ़ेंगे अपने बच्चों के स्कूलों में क्रेन स्कूल जैसी Quality
और उनके Principals में Fr. Jose जैसी Personality,

तो फिर दिल का बोझ दोस्तों को बताने में यही FB Group काम आएगा,

और हमारे दोस्तों में से कोई हमको समझाएगा,

तू भी नादान है, Fr. Jose जैसा दूसरा नहीं मिलेगा,
जहाँ भी मिले Admission करवा दे, कहाँ कहाँ भटकेगा

10 मार्च 2011

पागल


लोग पुकारें मुझको पागल,
मारे ताने बेवज़ह।
इसमें क्या दोष मेरा,
मुझे तू दिखती हर जगह।

सुख दुख आँख मिचोली खेलते थे,
जब जीता था अपनों में।
अब तो बस सुख ही सुख है,
जब से जीता हूँ तेरे सपनों मे।

लोग ग़म को भुलाते हैं,
शराब के सहारे।
मैं तेरी याद में मदहोश
पड़ा रहता हूँ तेरी गली के किनारे।

कोई मारे पत्थर
कोई गाली दे कर जाता है,
मैने किसी का क्या बिगाड़ा
मुझे समझ नहीं आता है.

मैं चिल्ला चिल्ला कर पुकारू तुझे
तो लोगों को गुस्सा आता है,
उनका पण्डित उनका मुल्ला
माइक पर चिल्ला किसको बुलाता है.

मैं दिखता हूँ गन्दा तो क्या,
मेरा दिल उनसे साफ है,
मेरा हँसना भी है उनको नागवार
उनका धर्म के नाम पर हत्या माफ़ है.

वे क्या जाने प्रेम का मतलब
जिनके लिए शादी व्यापार है,
तुम दुनिया छोड़ गई तो क्या
मुझको तेरी यादों से भी प्यार है.

करता हूँ बस याद तुझे,
और दूजा कोइ काम नहीं,
नहीं पहचानता किसी और को,
तेरे सिवा याद कोई नाम नहीं।

14 जन॰ 2011

कर्ज़ गुलामी जारी है


प्रस्तुत कविता की हरेक पंक्ति में एक प्रश्न है, जिसका उत्तर हम सबको मालूम है। भारत की ऐसी परिस्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है? जरा ठहरिये, आप चाहे जो भी नाम लें उन सबमें एक समानता है। वे सभी स्वार्थ, लालच आदि जैसी बिमारियों के शिकार हैं/थे। कया आप इन बिमारियों से ग्रस्त नहीं हैं? तो फिर इस परिस्थिति के लिए आपको भी ज़िम्मेदार क्यों न माना जाए? आत्मचिंतन ज़रूरी है। 

लाल किले पर जो झंडा शान से लहरा रहा है,
जिनका खून है इसके धागे में, याद उनकी दिला रहा है।

आज़ाद भारत में दर्द न होगा, यह सोंच लाठियाँ सह जाते होंगे,
आज़ाद भारत में कोई भूखा नहीं सोएगा, यह सोंच भूख में भी मुस्काते होंगे।

छुप-छुप के जीते होंगे, यह सोंच हम चलेंगे सीना तान,
हमें शान की ज़िन्दगी देने के लिए हँसते-हँसते हो गए कुर्बान।

उन बलिदानियों की आँखों में कुछ ऐसे सपने होंगे,
फिर से चहकेगी सोने की चिड़िया, जब संसद में अपने होंगे।

सुशासन की बयार बहेगी, जब अपने होंगे सरकारी पदों पर,
कोई कलम से विकास गाथा लिखेगा, कोई नज़र रखेगा सरहदों पर।

नहीं होंगे साम्प्रदायिक दंगे, जब फूट डालने वाले चले जाएँगे,
नहीं होगा कोई अगड़ा पिछड़ा, सब कदम से कदम मिलायेंगे।

जिन सपनों के लिए वीरों ने खून से लिखी इबारत,
वो सपने सपने रह गए, बस आज़ाद गो गया भारत।

अज़ाद हुआ अंग्रेजों से पर समस्याओं से आज़ाद हो न सका,
उसका बलिदानी लाडला अब तक चैन से कब्र में सो न सका।

गाँधी, असफाक, सुभाष, भगत सिँह, उनका हम सब पर कर्ज़ है,
उनके अधूरे काम को पूरा करना अब हम सब का फर्ज़ है।



जो खून बहा था सड़कों पर उसमें एक भी कतरा मेरा नहीं था,
जब अमृतसर में बिछ रही थीं लाशें मैं चादर तान सो रहा कहीं था,

जो दे गए हमें आज़ादी उनका कर्ज़ चुकाना होगा,
उनके सपनों का भारत अब जल्द बनाना होगा।

हमें आज़ाद करने को सब कुछ लुटा गए अभागे,
और हम पल में घुटने टेक देते हैं अपने स्वार्थ के आगे।

चोरी घूसखोरी, सीनाज़ोरी जैसे भी अपना काम हो बनता,
अपना फायदा होता रहे, चूल्हे में जाए जनता।

जब तक देश में मौजूद भ्रष्टाचार, भूखमरी, बेकारी है,
घोषित हो स्वाधीन भले हीं, मगर गुलामी ज़ारी है।

आओ अपने स्वार्थों की दे दें आहुति, देश नहीं माँग रहा प्राण,
शहीदों के सपनों का भारत बन जाए हमारा भारत महान।

प्रकाशित: लेखापरीक्षा प्रकाश, जुलाई-सितम्बर 2010.

  

3 जन॰ 2011

किराए का मकान

इस बार के चिट्ठे मे पढ़िए एक कहानी: निर्जिव, पराए किराए के मकान से एक स्त्री के भावनात्मक जुड़ाव की। ये कहानी मैंने 2003 में लिखी थी। हँसराज कॉलेज में मुझे जर्मन भाषा पढ़ाने वाली प्रोफेसर प्रतिभा भट्टाचार्जी अपने पुराने सरकारी क्वार्टर्स को छोड़ कर अपने नए मकान में जाने वाली थीं। हमें पढ़ाते पढ़ाते अक्सर भावुक हो उठती थीं। उनकी भावनाओं के उपर तानाबाना बुन कर तैयार की गई है ये काल्पनिक कहानी। इसके सभी पात्र और घटनाएँ कालपनिक हैं एवं उनका जीवित अथवा मृत किसी भी व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। उम्मीद है आपको अच्छी लगेगी।


15 वर्ष पहले जब मैं यहाँ आई थी तब यह घर हमारे लिए अनजान था और हम भी इसके लिए अज़नबी। घर में घुसते हीं लगा मानो हर दरवाजा, हर खिड़की पूछ रहे थे, आप कौन? कई मायनो में उन्होंने भी हमें अपनाने से अपना विरोधा जताया था। कभी खिड़की से चोट तो कभी रसोईघर के छोटे दरवाजे की चोखट से। सीढ़ीयाँ देख देख कर चढ़ते थे और दरवाज़े खिड़कीयों की कुण्डियाँ देख –देख कर बन्द करते थे।

पीछे की बगिया में मुरझाए हुए पौधे और फूल अपनी उदासी (पुराने किराएदार के जाने पर) साफ बयान कर रहे थे। पिछले किरायेदार के बच्चे भी थे शायद, जिन्होंने दीवारों पर कुछ फूल पत्तियाँ, तो कहीं जानवरों के चित्र भी बना रखे थे। हालाँकि सारे चित्र पेंसिल या मोम के रंगों से बनाए गए थे पर मुझे वे अच्छे लग रहे थे। जब मेरे पति ने कहा कि महीने दो महीने बाद आने वाली दीपावली के पहले सफेदी करवा कर इन्हें मिटा देंगे तो मन ही मन मुझे अच्छ नहीं लगा था।

घर में आने के पहले दिन हीं गुसलखाने की नाली जाम हो गई। हमें लगा मानो हमारे साथ धोखा हुआ है। क्या यह समस्या हमेशा हीं रहेगी? गुस्से में आकर मेरे पति जब मकान मालिक से शिकायत करने गए तब उसने भी अनभिज्ञता ज़ाहिर की और कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। साफ सफाई करवाने पर जब सारे आफत की जड़ पोलिथिन का एक टुकड़ा बाहर आया तब हमने राहत की साँस ली। अब मुझे शक होता है कि कहीं यह गुसलखाने का हमें अस्वीकार करने के इज़हार का एक तरीका तो नहीं था? हो सकता है।

समय बीतता गया दिनब-दिन कुछ नया होता गया और हर घटना हमें इस घर से और जोड़ती गई। राहुल का जन्म हमारे इसी घर में आने के चार महीने बाद हीं हुआ था। मैं कैसे भूल सकती हूँ वह कोने वाला कमरा जो प्रसव पश्चात बीस दिनों के लिए मेरा आश्रय था। हमारे यहाँ एक प्रथा है कि प्रसूता स्त्री को 20 दिनों तक अलग एक कमरे में काटना पड़ता है। सासू माँ और पिता जी उन्हीं दिनो अपना सारा सामान लेकर हमारे साथ रहने आ गए। मैंने ही बुलवाया था उन्हें, गाँव में रखा भी क्या था। पिता जी के खेत तो इनकी पढ़ाई के लिए बिक गए थे, फिर पिता जी की उम्र भी आराम करने की हो चली थी। गाँव की अपनी दुकान बेच कर जब वे और माँ जी हमारे साथ रहने आ गए तब मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। अब राहुल के पापा के दफ्तर चले जाने के बाद मुझे सुना सुना नहीं लगता था। राहुल के आने के बाद वह खुशी चार गुनी हो गई थी। राहुल के बाद नेहा आई और पूरा घर हर समय दादा – दादी और पोते-पोती के कह-कहों से गुंजता रहता था।

समय मानो तेजी से भागता जा रहा था। खुशी के दिन तो वैसे भी जल्दी-जल्दी कटते हैं। पर एक बात तो तय थे कि हर जाता हुआ दिन हमारे आपसी और इस घर से हमारा नाता और गहरा करता जा रहा था। अब सीढ़ीयाँ देख कर चढ़नी नहीं पड़ती थी और खिड़कियाँ दरवाजों की सिटकनियों को तो मानों हाथों ने भी देख लिया था। पड़ोसियों से भी दोस्ती हो गई। चार पाँच सालों में तो ऐसा लगने लगा मानों हम सदा से यहाँ हीं रहते आए थे।

दस साल बीत गए। एक दिन हँसते-बतियाते पिता जी चल बसे। उनके बिना तो यह घर तो बस काटने को दौड़ता था। दिन भर लगता मानो राहुल और नेहा से मज़ाक करने के बाद उनकी हँसी गूँज रही हो। खैर समय ने ये घाव भी भर दिए, पर माँ जी की आँखों में आज भी सूनापन दिखता है। बहुत प्यार करते थे दोनो एक दूसरे से।

करीब तीन साल पहले राहुल के पापा ने एक दिन जब मुझसे कहा कि पास में अपना घर खरीदने लायक पैसे हो गए हैं तब मैं फूले न समाई। अपने घर का सपना जो पूरा होने वाला था। पिता जी कि दूकान के पैसे जो इन्होंने फिक्स्ड डिपोज़िट करवा रखे थे उसके पैसे भी मिलने वाले थे। मिला जुला कर इक अच्छा मकान बनाने  लायक पैसे हो गए थे। मकान के लिए जमीन की खोज़ शुरू हुई। पर यह इतना आसान नहीं था, हाथों में पैसे रहते हुए अच्छी जगह ज़मीन नहीं मिल रही थी। दो साल के बाद यह खोज़ खत्म हुई। कानूनी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद जब मकान बनाने की बारी आई तो हमने ठेकेदारों की सेवाएँ लेने से साफ इनकार कर दिया। हम अपना मकान अपनी पसन्द से अपनी निगरानी में बनवाना चाहते थे।

जिस दिन भूमिपूजन के साथ उस पर पहली ईंट पड़ी उसी दिन मुझे अहसास हुआ कि हमें पुराना मकान छोड़ना पड़ेगा। धीरे-धीरे ये बेचैनी बढ़ती गई। पिछ्ले हफ्ते मैंने कैमरे की फिल्म के दो रोल खरीदे। मैं मानो घर के कोने-कोने को तस्वीर में कैद कर लेना चाहती थी। जब इन्होने देखा कि एक रोल के बाद दूसरा भी मकान पर ही खर्च होने वाला है, तब इन्होंने मुझे टोका और कहा - अब बस भी करो। पर मुझे बुरा नहीं लगा । क्योंकि उनको क्या पता, रोज़ के चौबीस घंटों के मुकाबले उनके तो दस बारह घंटे ही बीतते थे घर पर। उनको समझ में कैसे आती मेरी भावनाएँ ।

आज सुबह सारा सामान खाली कर हम नए आशियाने की तरफ बढ़ चले है। पीछे ऑटो में नेहा, माँ जी और राहुल आ रहे हैं। मैं और ये ट्रक की अगली सीट पर बैठे हैं। मन में हलचल चल रही है। अब शायद दर्द आँसू बन कर बह निकलेगा। अपने आप को रोकना मुश्किल हो रहा है। खैर मायके से ससुराल आते वक्त भी तकलीफ हुई थी पर यह उससे अलग है। उस समय मन को ढाढस बंधा दिया था कि यह सब तो सामाजिक रीत है। पर इस बार बस एक ही ढ़ाढस है कि अब ऐसी जुदाई नहीं झेलनी पड़ेगी। पीछी ट्रक में लदे सामान भी मानो आवाज़ दे दे कर चिल्ला रहे हैं कि हमें भी नहीं जाना है। इन निर्जीवों का तो नाता ज्यादा गहरा होगा मेरे निर्जीव पुराने घर से। और मेरे आँसू बह निकलते हैं।

प्रकाशित: सुबह-जुलाई-सितम्बर 2006

22 नव॰ 2010

कोई अपना होता


इस अनजाने शहर में,
काश कोई अपना मिल जाता,
जिसे हम अपने मन की सुनाते,
जो अपने दिल की बताता.

साथ चलता कोई
इन अनजाने गलियारों में,
भर देता सुखद अर्थ कोई
इन बेअर्थ बहारों में.

कोई होता ऐसा कन्धा,
जिस पर जब अपना सर रख देता,
वो सुख भर देता जीवन में,
सारी पीड़ा हर लेता.

अब तक तो मेरा साथी है,
बस मेरा अकेलापन, जो साथ नहीं छोड़ता,
शहर के गलियारों में, महफ़िल में, तन्हाई में,
मुझसे मुँह नहीं मोड़ता.

प्रकाशित: सुबह

15 नव॰ 2010

आपका एक ब्लॉग तो होना हीं चाहिए

 

यह लेख मैंने मेरे विभाग भारतीय लेखा एवं लेखापरीक्षा विभाग (CAG) के अधिकारियों के लिए लिखा है जिनमें से कई अभी तक ब्लॉगींग की ज़ादूई दुनिया से दूर हैं। इसे मैं अपने विभाग के लेखापरीक्षा-प्रकाश नामक त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए देने की सोंच रहा हूँ। मैं आप तमाम चिट्ठाकार मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि आप इसे पढ़ कर इसमें यदि कुछ जोड़ सकें जो कि चिट्ठाकारी को मेरे विभाग के अधिकारियों के मन तक पहुँचा सके तो कृपा होगी। आपके द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को शामिल करने के बाद हीं मैं इसे लेखापरीक्षा के अगले अंक के लिए भेजूँगा।

आपका एक ब्लॉग होना हीं चाहिए

ब्लॉगों के बारे में सुना है आपने? कमसे-कम एस ए एस परीक्षा (अधिनस्थ लेखापरीक्षा सेवा परीक्षा)  के सूचना प्रोद्योगिकी के प्रश्नपत्र की तैयारी के समय रटा तो जरूर होगा Blog एक परिवर्णी शब्द (Acronym) है जिसका पूरा स्वरूप है वेब लॉग अर्थात अंतर्जाल (Internet) पर लिखा जाने वाला रोजनामचा (log)। पर इसे रोजानमचा भी मत समझ लीजिएगा। आज ब्लॉग एक रोजनामचा से कहीं ज्यादा है और अगर आप अधिकतम चिट्ठाकारों (Bloggers) के चिट्ठों (Posts) को देखेंगे तो आपको इस शब्द का प्रायोगिक मतलब समझ में आएगा जो रोजनामचे से कहीं अधिक है। ब्लॉग पर सिर्फ गद्य और पद्य  हीं नहीं बल्कि मल्टीमिडिया फाइले जैसे कि गाने, तस्वीरें और चलचित्र भी संजोये जा सकते हैं ।
अगर आपको लगता है कि अभी यह तकनीक नई है तो आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि जस्टीन हॉल को 1994 में प्रथम बार ब्लॉगिंग करने का श्रेय दिया जाता है। वेबलॉग शब्द का ईज़ाद 17 दिसम्बर 1997 को श्री जोर्न बार्जर (Jorn Barger) ने किया था परंतु वेबलॉग को पीटर मेर्होल्ज़ (Peter Merholz) ने अपने ब्लॉग पर प्रथम बार ब्लॉग नाम से पुकारा। हुआ यूँ कि 1999 में उन्होनें मज़ाक में अपने ब्लॉग पर Web Log के We और bLog को अलग अलग लिख दिया। अगर आप इसके क्रमिक विकास के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं तो फिर विकिपिडिया (http://en.wikipedia.org/wiki/Blog) पर जा कर इसके जन्म, विद्यारम्भ आदि विभिन्न संस्कारों के बारे में पढ़ सकते हैं ।

ब्लॉगिंग एक समांतर पत्रकारिता का रूप ले चुका है। वह राजनैतिक संकट, जिसके कारण अमरीका के सीनेटर ट्रेंट लॉट्ट को इस्तीफा देना पड़ा, लोगों की ब्लॉगिंग की हीं उपज़ थी, अन्यथा मिडिया ने तो उनके विवादास्पद बयान को तो जैसे दबा हीं दिया था । ऐसे कई उदाहरण हैं जो यह साबित करते हैं कि ब्लॉग जनता की आवाज़ बनती जा रही है। भारत के कुछ धुरन्धर चिट्ठाकारों ने 2009 में इलाहाबाद में चिट्ठाकारों का एक सम्मेलन आयोजित किया था जिसमें नामी लेखक श्री नामवर सिँह ने भी भाग लिया था। हाल हीं में दिल्ली भी ऐसा एक आयोजन देख चुका है। इससे यह साबित होता है कि भारत में भी अब चिट्ठाकारी को लोग गंभीरता से लेने लगे हैं।
ब्लॉग दिवस :  हर वर्ष चिट्ठाकारों की दुनिया में 31 अगस्त को ब्लॉग दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिनांक को चुनने का कारण है 3108 लिखने पर उसका अंग्रेजी में Blog की तरह दिखना। ज्यादा जानकारी http://www.blogday.org पर उपलब्ध है।

अगर आपको लगता है कि आपको ब्लॉगिंग करने की जरूरत हीं क्या है तो ब्लॉगिंग के निम्न फायदों पर गौर कीजिए:
1)       आपकी मित्र मंडली बढ़ेगी : हो सकता है कि आपकी मित्र मंडली में आपको और आपके अनोखी बातों को कोई तरज़ीह नहीं देता हो, पर ईंटरनेट पर आपको अपने जैसे अनेको मिल जाएँगे जो आपकी तरह सोंचते हैं अथवा आपके बातों की खामियों को आपके मित्र से बेहतर तरीके से आपको समझा सकते हैं । चाहे जो भी हो आपकी मित्र मंडली में इज़ाफा होगा और आप अपने आपको अकेला महसूस नहीं करेंगे। आपको बताते हुए हर्ष हो रहा है कि मेरे ब्लॉग को अब तक 2010 मई से 2010 दिसम्बर तक भारत से 366 बार अमरीका से 88 बार यूनाईटेड किंगडम से 2 बार पाकिस्तान से 2 बार, जर्मनी से एक बार, रूस से एक बार, स्वीडन से एक बार और दक्षिण अफ्रिका से एक बार देखा जा चुका है। इसके पहले की अवधि की सांख्यिकी उपलब्ध नहीं है क्योंकि यह सुविधा मेरे ब्लोग प्रदानकर्ता कम्पनी गूगल ने हाल ही मे शुरू की है। और तो और अब तक कुल 30 टिप्पणियाँ भी आ चुकी हैं । है ना ये दिल खुश करने वाली बात? कई विदेशी नेता तो ब्लॉगिंग का प्रयोग कर अपने चुनाव क्षेत्र की आम ज़नता के साथ दीवाने आम लगाते हैं।
2)       यह आपकी पहचान का हिस्सा बन जाती है: अपने विभाग में में निदेशक सुश्री अतुर्वा सिन्हा, जो कि ब्लॉगिंग की शौकीन हैं, ने अपने ब्लॉग My Blue Dot of Thoughts पर लिखा है (अनुवादित):  “युद्ध संस्मरण के लेखक एलन शॉ ने अपनी किताब "Marching on to Laffan's Plain" का एक अंश मेरे ब्लॉग पर पढ़ने पर मुझे एक पत्र लिखा. वहीं एक अन्य अवसर पर जब मैंने एक व्यापार सहयोगी को फोन लगाया तो उसकी सचिव ने फोन लगाने से पहले मुझसे पूछा कि क्या मैं वही अतुर्वा हूँ जो Blue Dot of Thoughts नामक ब्लॉग लिखती है? मैं तो दंग रह गई!“ यह अनुभव किसी का भी हो सकता है, आपका भी। इस दुनिया में हर एक आदमी एक दूसरे से भिन्न है और यही हम सब के व्यक्तित्व की सुन्दरता है । ब्लॉगिंग इसे और निखारता है। आज के ज़माने में अगर दीवार जैसी फिल्म दुबारा बनती है तो उस फिल्म के प्रसिद्ध “मेरे पास माँ वाले सीन में” एक ज़ुमला और अवश्य जुड़ जाएगा: मेरे ब्लॉग के 10000....0 लोअर्स (अनुसरणकर्ता) हैं, तुम्हारे कितने हैं???
3)       यह आपके लेखापरीक्षा के काम में भी मदद कर सकती है:अगर आप शर्लक होम्स छाप लेखापरीक्षा में विश्वास रखते है तो ब्लॉगिंग आपके काम आ सकती है। कई विभागों के कर्मचारी ब्लॉगों मे अपने कार्यालय में व्याप्त गड़बड़झाले को उजागर करते रहते हैं (भले गुमनाम रह कर ही)। तो फिर उठाइये दूरबीन …इश्स्स्स्स…माउस और शुरू हो जाइये।
4)       यह आपके अन्दर छुपी हुई प्रतिभा को निखारने में मदद करेगा: आप अपने दिमाग को और उसकी छुपी हुई शक्तियों को जानने में सफल होंगे। अगर आपको यकीन नहीं हो रहा है तो आप अभी किसी विषय पर लिखने का प्रयास कीजिए। आप पाएँगे की आपको खुद से इतने अच्छे लेख की उम्मीद नहीं थी। 
5)       ब्लॉगिंग आपको आपकी समस्याएँ सुलझाने में मदद कर सकता है: अगर आप लोगों से सलाह लेकर अपनी समस्याएँ सुलझाने में यकीन रखते हैं पर अपनी बात को लोगों से बताने से भी डरते हैं तो बना लिजिए एक गुमनाम ब्लॉग और भेज दीजिए अपनी समस्याएँ दुनिया के लोगों के कम्प्यूटर स्क्रीन पर। जल्द हीं आपका तारनहार कोई रामवाण सूझा हीं देगा । अगर कोई सलाह न भी दे तो मन में गुणा जोड़ कर के जीवन के गणित को सुलझाने से अच्छा है कि उसे कागज़ पर कर के सुलझाया जाए। यही कारण है कि कई मनोवैज्ञानिक गहन से गहन मानसिक बिमारियों में डायरी लिखने की सलाह देते हैं। आश्चर्य नहीं है कि भड़ास नाम से भी एक ब्लॉग मौजूद है। दिमाग में अच्छी बाते ही रहनी चाहिए, कुंठा, घृणा, इर्ष्या आदि को बाहर निकाल देने में हीं समझदारी है। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से पता चलता है कि मनोवैज्ञानिक इसके उपर शोध कर रहे है और उन्हें लगातार नई नई बाते मालूम चल रही हैं। दिमाग बड़ा ज़टिल है, है न?
6)       आप दुनिया को बेहतर समझ सकते हैं: ब्लॉगिंग के द्वारा आप आम आदमी से जूड़ते हैं जो कोई महान शक्सीयत नहीं है बल्कि आपकी तरह एक आम आदमी है, जो कुछ बोलता है या सोंचता है तो उसके पहले छवि, पद, गरिमा की चिंता नहीं करता। इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा।
7)       आपकी लेखन क्षमता का विकास होगा: बचपन में स्कूल में आपने निबन्ध आदि तो लिखा हीं होगा। यहाँ तक की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में भी निबन्ध एक विषय है। आखिर इसके पीछे कुछ तो कारण अवश्य है! वह कारण है लेखन क्षमता का विकास और प्रस्तुतिकरण के तरीके में सुधार होता है। पाठकों की राय तो आपके लेख को और सुधारने में मदद करती है और प्रशंसा आपका हौसला बढ़ाती है। लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों को तैयार करते करते हमारा लेखन कौशल इतना तो बन ही जाता है कि हम तथ्यों को रचनात्मक रूप में प्रस्तुत कर सकें। कार्यालयी प्रतिवेदनों में तो हमारी लेखनी विनम्रता से बोलने को मज़बूर होती है पर समसामयिक विषयों पर हम अपना वक्तव्य अपनी मर्जी से लोगों के सामने तो रख हीं सकते हैं।
8)       जानकारी में बढोतरी :  सामान्यता किसी विषय पर ब्लॉग लिखने से पहले लोग उस विषय से सम्बन्धित अन्य ब्लॉग जरूर पढ़ते हैं, इससे उनकी जानकारी तो बढ़ती ही है। अपने ब्लॉग पर मिली रायों (comments) से रही सही कसर भी पूरी हो जाती है। कभी कभी आपका पाठक किसी ऐसे ब्लॉग के बारे में आपको बताता है जिसमे उसी विषय के उपर आपसे अच्छा लिखा है। ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और संजो कर रखने से सड़ जाता है। अपना ज्ञान लोगों से बाँटने से आपको उसी विषय पर लोगों के विचार भी जानने को मिलेंगे। यह निश्चय हीं आपके मौजूदा ज्ञान में वृद्धि करेगा और उसमें मौजूद रिक्त स्थानों (Gaps) को भरेगा। सीखना एक सतत प्रक्रिया है। चलती रहनी चाहिए।
9)       कौन सुनेगा किसको सुनाएँ, इसिलिए चुप रहते है ?  बन्द किजिए रोना और खुल कर चिल्लाइये ब्लॉगजगत में। अजी जरूर सुनेंगे दम तो लगाइये। वैसे ये समस्या मेरे जैसे नवजात कवियों के साथ ज्यादा होती है। भीड़ भाग जाती है हमारी कविताएँ सुन कर। लेखापरीक्षा-प्रकाश के अलावा ब्लॉग हीं एक माध्यम है जिसके जरिए हम श्रोता तलाशते रहते हैं। लेखापरीक्षा-प्रकाश कोई पढ़े न पढ़े मेरे ब्लॉग पर मख्खनी अन्दाज में जब पाठक प्रशंसा करते हैं तब दिल गद-गद हो जाता है।   
10)    सेवानिवृति के बाद एक अच्छा टाइमपास: अगर जोड़ों के दर्द के कारण आप सेवानिवृति के बाद अपने मनपसन्द मित्र के घर नहीं जा सकते और उनके आपके घर में जमे रहने को आपकी बहू पसन्द नहीं करती तो आप ब्लॉगिंग के ज़रिये उनसे विचारों की कुश्ती ज़ारी रख सकते हैं और इसमें हम युवाओं को भी शामिल कर सकते हैं । कुछ हमें भी बता के जाएँ चचा और हमारी भी सुन लें। अच्छा रहेगा ना। याद कीजिए राजकपूर के एक फिल्म का वो गाना “एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल”| ब्लॉगिंग की बदौलत आप अपने बोल-वचन (विचार) तो दुनिया के लिए छोड़ कर जा हीं सकते हैं जो कि डायरी के पन्नों की तरह पीले हो कर आपके पोते परपोतों के द्वारा रद्दी में नहीं बिकेंगे। इसलिए इससे पहले कि आप अपने प्राणों से प्रिय अपने शरीर को राख़ या मिट्टी में मिलते देखें, अपने व्यक्तित्व को एक ब्लॉग के माध्यम से आत्मा की तरह अमर कर दें।
11)    हो सकता है कि आपका ब्लॉग किसी प्रकाशक की नज़र में आ जाए और आप लेखक/कवि बन जाएँ: मैं मज़ाक बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ, ऐसा बहुतों के साथ हुआ है। कई किताबों के प्रकाशकों ने लेखक को उनके ब्लॉग देख कर हीं चुना। लेखापरीक्षा से सम्बन्धित अपने तकनीकी कौशल को यदि आप ब्लॉग का रूप देकर पूरे विभाग के लिए उपलब्ध कराते हैं और यह उच्च अधिकारियों की नज़र में आता है तो मेरे विचार से वे निश्चय हीं हमारे विभाग से सम्बन्धित प्रशिक्षण पुस्तक अथवा नियम पुस्तकों के लिखते समय आपका सहयोग लेना चाहेंगे।

एक नौसिखुआ चिट्ठाकार के सामने आने वाली समस्याएँ और उनका समाधान:
1.                   लिखने के लिए विषय का अभाव: ब्लॉग के विषय कुछ भी हो सकते हैं, समाचार पत्र मे पढ़े गए किसी घटना के बारे में आपके विचार, आपके कार्यालय में हाल में सम्पन्न कोई समारोह, किसी टी वी सिरियल में हो रही घटनाओं पर आपके विचार या यों कहलें आपके दिमाग में जितने भी विषय आ सकते हैं वे सभी। यह तो अंतर्जाल पर आपके मोहल्ले के नुक्कड़ का प्रतिरूप हीं है। पकड़ कर कैद कर लिजिए अपने विचार, इससे पहले की वे दिमाग के सागर में मोती की तरह खो जाएँ। विचार बड़े चंचल होते हैं, मछली की तरह, आपने छोड़ा नहीं कि बस उनको दुबारा प्राप्त करना बड़ा कठिन हो जाएगा। अच्छा है कि उसे एक कागज़ पर लिख लें और समय मिलने पर उस पर एक ब्लॉग लिख डालें। तैयार हो गया आपके ब्लॉग के लिए अगला चिट्ठा (Post)।

2.                   अमर्यादित शब्द एवं विषय: कुछ लोग अंतर्जाल पर गुमनाम रहकर अपने मन में छुपे शैतान को बाहर करने में लगे रहते हैं और चिट्ठाकारों और उसके पाठकों के मुँह का ज़ायका बिगाड़ते रहते हैं।  इससे नफ़रत फैलती है और मर्यादा का ध्यान रख कर किया जाने पर हीं आपके ब्लॉग पर स्वस्थ बहस की बगिया महक सकती है। ऐसे शरारती तत्वों के साथ निबटने का तरीका है मॉडरेशन विकल्प का प्रयोग जिससे बिना आपकी अनुमति के किसी भी पाठक की टिप्पणी आपके ब्लॉग पर नहीं दिखेगी। कहने की ज़रूरत नहीं है कि आप भी आवेश में अथवा किन्हीं अन्य कारणों से किसी के ब्लॉग में कूड़ा उड़ेलने से बचें। ब्लॉग आपके स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है, स्वच्छंद विचारों का नहीं।

3.                   नई मिली बोलने की आज़ादी का दुरूपयोग:  कई लोग ब्लॉगिंग का प्रयोग अपने अन्दर छुपी भड़ास निकालने के लिए करते हैं चाहे वह अपने नियोक्ता, बॉस के प्रति हो या किसी धर्म, राजनैतिक पार्टी अथवा व्यक्ति के लिए। ऐसे में आपको इस बात से आगाह कराना उचित है कि कई मामलों में इससे चिट्ठाकारों को कानूनी कार्यवाई का सामना करना पड़ा है। चिट्ठाकारी का स्वर्णिम सूत्र है, वैसा कुछ भी नहीं लिखना जो वास्तविक जीवन में बोलना अनुचित है। इस मायने में बेनामी रहना भी काम नहीं आता है, क्योंकि यदि मामला आपराधिक हो तो जाँच एजेंसीयाँ दोषी को ढ़ूँढ़ निकालती हैं। वैसे चिट्ठाकारों की आचार संहिता के बारे में जानना हो तो आप http://en.wikipedia.org/wiki/Blogger's_code_of_conduct पर जा कर पढ़ सकते हैं।

4.                   आगंतुकों का न आना: अगर आपके ब्लॉग पर दो चार चिट्ठे लग चुके हैं तो आप अपने ब्लॉग को चिट्ठा समूच्चयक (Blog Aggregator) पर पंजीकृत करवा लें। इन एग्रीगेटरो का काम होता है उनके साथ पंजीकृत चिट्ठाकारों के चिट्ठों का शीर्षक एवं शुरू के कुछ वाक्य प्रकाशित होते ही उनके मुक्य पृष्ठ पर सूचित कर देना। इससे आपके ब्लॉग के आगंतुकों में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होगी । हिन्दी ब्लॉग जगत में http://chitthajagat.in/ पर उपलब्ध  चिट्ठाजगत नाम का चिट्ठा समूच्चयक काफी लोकप्रिय हो चुका है ।

5.                   आगंतुकों की टिप्पणियाँ नहीं आना: कोई ज़रूरी नहीं है कि आपके ब्लॉग पर हर पाठक टिप्पणी छोड़ कर हीं जाए। यह पाठक के लेखन क्षमता, मूड, समझ, आपके ब्लॉग को क्लीक करने के उद्देश्य (हो सकता है कि आपके ब्लॉग में आपने कोई शब्द कई बार इस्तेमाल किया हो पर आपका चिट्ठा उस शब्द के बारे में नही है। ऐसे में पाठक को गूगल सर्च इंजन भूल से आपके ब्लॉग तक ले आता है। )टिप्पणियों की संख्या उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी की आगंतुकों की संख्या। फिर भी पाठकों से टिप्पणियाँ निकलवाने का एक बेहतर तरीका बताता हूँ। चिट्ठाकारी की दुनिया में एक बात बहुत काम आती है: “ दूसरों से भी वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि तुम्हें अपने साथ अपेक्षित है”  कहने का सीधा-सीधा मतलब है-तू मेरी गा  मैं तेरी गाउँ। यदि आप चाहते हैं कि लोग आपके ब्लॉग पर आएँ और आपके चिट्ठों पर भी टिप्पणियाँ करें तो ऐसा आपको उनके चिट्ठों के साथ भी करना पड़ेगा। ध्यान रहे ऐसा आप इमानदारी से करें अर्थात उनका चिट्ठा पढ़ने के बाद। सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से। अच्छा होगा यदि उन चिट्ठों पर टिप्पणी करें जो आपके विषय से सम्बन्धित हैं।
6.                   घर पर इन्टरनेट की अनुप्लब्धता और कार्यालय में काम का बोझ: यदि आपके घर में कम्प्यूटर है तो आप घर बैठे वर्ड में अपना चिट्ठा तैयार कर दें। कार्यालय में पाँच मिनट का समय तो निकाल हीं सकते हैं भोजनावकाश के समय? उसी समय इंटरनेट खोल कर अपने ब्लॉग पर अपना अगला चिट्ठा चस्पा कर दें। साथ हीं साथ आए हुए नई टिप्पणियों को वर्ड में चस्पा कर घर ले जाएँ जिससे कि आप बिना किसी परेशानी के आराम से उसे पढ़ सकें और उत्तर तैयार कर सकें। न हिंग लगेगी, न फ़िटकरी और रंग भी चोख़ा आएगा।
कैसे बनाएँ अपना ब्लॉग
इससे पहले कि आप कीबोर्ड ले कर ब्लॉगिंग की दुनिया में कूद जाए आपसे अनुरोध है कि आप थोड़ा माउस घीस लें। कहने का मतलब है कि कुछ अच्छे ब्लॉग ज़रूर देख लें। अब मुझे ज्यादा तो नहीं मालूम फिर भी मुझे निम्न ब्लॉग्स अच्छे लगे:
शीर्षक
पता
लेखक
भाषा
विषय
मेरे मन के आईने में
मैं
हिन्दी, अंग्रेजी मिश्रित
कविताएँ, लेख
A Blue Dot of Thoughts
सुश्री अतुर्वा सिन्हा, निदेशक, भारतीय लेखा तथा लेखापरीक्षा विभाग
अंग्रेजी
लेख, संस्मरण
Bend It- Nature explains it all
श्री हंसराज रॉय, सलेपअ, का: प्रधान निदेशक, लेखापरीक्षा, कोलकाता           
अंग्रेजी
रंगों का दार्शनिक विश्लेषण
चला बिहारी ब्लॉगर बनने
श्री सलील वर्मा, सरकारी सेवक
बिहारी हिन्दी
समसामयिक एवं दैनिक अनुभव
उड़न तश्तरी
श्री समीर लाल, चार्टर्ड एकाउंटैंट, कनाडा
हिन्दी
व्यक्तिगत अनुभव, व्यंग्य, कविताएँ
मिसगाइडेड मिसाइल
श्री कुमार आलोक, संवाददाता, दूरदर्शन
हिन्दी
समसामयिक         
संवेदना के स्वर
श्री सलिल वर्मा एवं श्री चैतन्य आलोक, दोनो सरकारी सेवक
हिन्दी
समसामयिक एवं दैनिक अनुभव
लाईट ले यार        
श्री सतीश सक्सेना
हिन्दी
समसामयिक एवं व्यक्तिगत अनुभव
चक्रधर की चकल्लस         
श्री अशोक चक्रधर, विख्यात हास्य कवि
हिन्दी
व्यक्तिगत अनुभव
देशनामा 
श्री खुशदीप सहगल
हिन्दी
समसामयिक एवं व्यक्तिगत अनुभव


अपने मनपसन्द विषय पर ब्लॉग तलाशने के लिए आप गूगल ब्लॉग खोजी इंजन की भी सहायता ले सकते हैं जिसका पता है: http://blogsearch.google.co.in/?hl=en&tab=wb । टेक्नोक्राटी भी एक मशहूर ब्लॉग खोजी इंजन है जो कि http://technorati.com/ पर उपलब्ध है।

तो फिर तैयार हैं एक ब्लॉग बनाने के लिए?  क्या चाहिए ब्लॉग बनाने के लिए: थोड़ी हल्दी, थोड़ा धनिया और नमक स्वादानुसार.....चिंता ना करें ऐसा कुछ भी नहीं लगेगा। वैसे तो कई कम्पनियाँ ब्लॉग बनाने के लिए सेवा देती हैं , मुझे इस मामले में blogspot.com सबसे बेहतरीन लगता है। इसका कारण है इसका Google के अन्य उत्पादों के साथ सरल सामंजस्य। मैंने अपना ब्लॉग भी Blogspot.com पर बनाया है। मैंने इसके लिए न्यूनतम आवश्यकताओं को नीचे लिख दिया है:
1)       एक Google खाता. अगर आप Orkut, Google Groups, Google Documents अथवा अन्य कोई भी गूगल उत्पाद प्रयोग करते हैं तो आपके पास गूगल खाता है। उसका लॉगइन और कूटशब्द (Password) प्रयोग कर आप आज हीं चिट्ठाकारी शुरू कर सकते हैं। अगर ना भी हो तो किसी भी Blogspot वाले ब्लॉग को खोलने पर आप उपर दायीं तरफ Create Blog पर क्लिक कर के अपना ब्लॉग बना सकते हैं। अगर आपके पास गूगल खाता है तो पहले Sign Inपर क्लिक करें उसके बाद Create Blog पर क्लिक करें।

2)       एक अच्छा सा पता। Blogspot पर के पते कुछ इस प्रकार के होते हैं: आपकेद्वाराचयनितशब्द.blogspot.com. आप सोंच विचार कर कोई अच्छा सा शब्द चुन लें। यदि वह किसी ने प्रयोग नहीं किया होगा तो आप निश्वय हीं उसे अपने ब्लॉग के पते का हिस्सा बना सकते हैं।


3)       एक अच्छा सा शीर्षक: यह आपके ब्लॉग के विषय से मेल खाना चाहिए। जैसे यदि आपका ब्लॉग गम्भीर विषयों पर है तो फिर कोई व्यंगात्मक शीर्षक इस पर नहीं जँचेगा।
4)       एक डिजिटल तस्वीर: अगर आपके पास आपकी एक डिजिटल तस्वीर है (स्कैंड या डिजिटल कैमरे से खींचा हुआ) तो अच्छा होगा वैसे यह भी जरूरी नहीं है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि आपकी तस्वीर पास से अच्छे प्रकाश में ली हुई होनी चाहिए और सजग रह कर खिंचवाई हुई होनी चाहिए।

ज्यादा खूबसूरत डिजाईन का ब्लॉग बनाने से ज्यादा बेहतर है ज्यादा खूबसूरत बातों का ब्लॉग बनाना। सुन्दर ब्लॉग लोगों को एक पल उसे पढ़ने को तो प्रेरित कर सकता है पर अगर बातें खोखली हुई तो फिर पाठक दुबारा आपके ब्लॉग पर नहीं आएगा। तो फिर शुरू हो जाईये। http://www.howtomakemyblog.com पर अन्य तकनीकी ज़ानकारियाँ उपलब्ध हैं । लेख को विराम देने से पूर्व उन अनगिनत लेखकों का धन्यवाद न करूं जिनके ब्लॉग को पढ़ने के बाद इस विषय पर मुझे खुद का एक लेख लिखने की प्रेरणा मिली तो बहुत बईमानी होगी।

अगर मेरे लेख से आपको अपना ब्लॉग बनाने की प्रेरणा मिली हो अथवा आप अभी भी संशय महसूस रहे हैं तो कृपया ईंटरनेट पर निम्न पता खोल कर एक कमेंट ज़रूर छोड़ जाएँ (यह भी कमेंट पाने का मेरा नया तरीका है)। मुझे अच्छा लगेगा।
http://kutariyar.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

प्रकाशित: लेखापरीक्षा-प्रकाश अक्तूबर-दिसम्बर, 2010

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