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13/11/2011

मेट्रो रेल ठेलम ठेल



जब से कोलकाता मेट्रो नए रास्ते पर चलने लगी बिना तैयारी,
खड़ा होना मुश्किल हो गया, बैलगाड़ी बन गई शान की सवारी।

रंग रोगन लगा दौड़ रहे हैं डिब्बे बुढ़े, पुराने,
कोई चूँ-चूँ ठक-ठक करता है कोई गाता बेसुरे गाने।

कुछ के पँखे ऐसे घूमते हैं जैसे दारू पी के झूमते हैं,
दरवाज़े भी लगने के पहले दस-बीस बार एक दूसरे को चूमते हैं।

पन्द्रह मिनट की यात्रा के लिए टिकट गेट पर पाँच मिनट इंतज़ार
उपर से पचास यात्रीयों के डिब्बे में दो सौ की भीड़ सवार

जो भी स्टेशन आता है भीड़ दूगनी तेज़ी से बढ़ती है,
अन्दर की भीड़ हर स्टेशन पर बाहर की भीड़ से लड़ती है।

फिर भी कुछ घुस जाते हैं, ठेलम ठेल मचाते हैं,
पर अन्दर घुसते हीं वे भी अन्दर के हो जाते हैं।

किसी का पैर कुचलता है, किसी की बच्ची रोती है,
छेड़-छाड़, मार-पीट, पाकेटमारी भी होती है।

छेड़-छाड़ की हद नहीं कोई, महिलाओं की हालत है बहुत बुरी,
अगर ज़ल्दी कुछ नहीं सुधरा, उनको लेकर चलना होगा चाकु छुरी।

आत्महत्या के लिए नहीं है इससे कोई बेहतर उपाय,
मात्र चार रूपए में , बिना कष्ट पल में स्वर्ग पहुँचाए।

जिस दिन कोई आफिस आवर्स में स्वर्ग को जाता है,
हज़ारों को देर करवा कर बॉस से डाँट खिलवाता है।

समझ नहीं आता ये मेट्रो है या लोकल रेल,
कब तक चलता रहेगा ऐसे ठेलम ठेल का खेल।

प्रकाश्य : 96वाँ अंक लेखा-परीक्षा प्रकाश

18/09/2011

अनशन है बेकार


कानून का किला बनाने से पहले उससे बाहर निकलने का सुरंग होता है तैयार,
उसके रखवालों के गले में पट्टा, हाथों में धारहीन थोथे औज़ार ।

धार हीन थोथे औज़ार जिनसे बस कटे आम जनता का पतला गला,
जो टूट जाए ज्यों हीं नेताओं, बड़े अफसरों की मोटी चमडी पर चला ।

43 सालों से पड़े-पड़े लोकपाल बिल हो गया कितना पुराना,
फिर भी हर सवाल के जवाब में प्रक्रियाधीन होने का पुराना बहाना।

ऐसे बिलों पर सांसद लड़ते हैं ऐसे, जैसे हो मुर्ग-बटेर
पर अपना वेतन भत्ता बढाने को एकमत होते लगेगी नहीं देर।

सी बी आई, सी वी सी के गले में होती है सरकारी रस्सी
आज़ाद सी ए जी के हाथों में बस है नखहीन-दंतहीन 1971 का डीपीसी

इमानदार अफसर जो ना गलने देता इनकी दाल,
 शक्तिहीन पोस्टींग देकर करते है किरण बेदी सा हाल,

लोगों के की इच्छा का गला दबा रहे लोकतंत्र के नाम पर,
कहते एक बार चुन कर के भेजा अब नज़र मत रखो हमारे काम पर

फिर पाँच साल बाद दारू, साड़ी, टी वी ले कर आएँगे,
फिर से तुम्हारे हाथों से,  तुम्हारा वोट ले कर जाएँगे

बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार की मार से, सारी जनता रहेगी बेहाल,
पाँच साल बाद करके झूठे वादे फिर से लगवा लेंगे बत्ती लाल।

जब तक जाति, धर्म, दारू, टीवी, साड़ी होगा वोट देने का आधार,
अन्ना हज़ारे , देशभक्ति के नारे, सारे अनशन हैं बेकार।

रामलीला मैदान जाओ, भारत का झण्डा लहराओ,
पर सबसे पहले निजी जीवन से भ्रष्टाचार दूर भगाओ

सख्त कानून लाओ, भ्रष्टाचारियों को जेल पहुँचाओ,
पर दूसरों को सुधारने से पहले खुद तो सुधर जाओ।

मैं भी अन्ना तू भी अन्ना, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाओ,
 पहले 50 रूपये सरकाने की जगह 300 का चालान कटवाओ।

अगले चुनाव में इमानदारी समझदारी के साथ बटन दबाना,
दारू, साड़ी, टीवी जाति धर्म के बहकावे में मत आना।

जब तक जनता नहीं लेती, चुनाव में चुनना सीख,
तब तक दफ्तरों में लेने देने वाले मिल जाएँगे घूस की भीख। 

09/08/2011

Journey to Jaipur with Kids as Co-passengers


What a style.


लंगोटिया यार

मास्टर जी Tension Me
Model in the making

पढ़ाकू लड़के
सीधी बच्ची
मुँह में खिड़की
पक्की सहेलियाँ






This was just another official trip to Jaipur. Unlike my colleagues in the field offices, who are regularly on trip to one station or the other in their respective states, being at CAG HQs, I have comparatively eventless life without many trips. This was my second trip in a row after trip to Ranchi. Having woken up at 3:30 in the morning to catch the 06:05 Ajmer Shatabdi, I was feeling asleep and was almost in the other world when sudden laughter and shouting of some 50 odd 5-6 year olds woke me up, I knew this journey is going to be somewhat special, other than many others that I have undertaken. I found the experience too tempting to add one post on this to my blog.
Soon after they were on their seats, jumping and fighting started.  Tea kit was served to all. I saw one girl making tea with the cold Rail Neer mineral water that had just been served. Her friend mocked at her and called out for “ Miss” saying “मिस-मिस देखिए इसने क्या किया?”.  While some were looking at tea kit with wonder, some tore it apart to find their favorite stuff: the dairy whitener. I still remember the golden childhood days when the dairy whitener meant for emergency situations to serve tea to guests could not last longer due to the three mischievous two legged rodents of the home.   
Isn’t it unfair to offer children with something they should not be having at this age? Why doesn’t the Railways provide for some other healthy alternative for the children?
Two boys were busy in the usual डिशूम-डिशूम until the teacher intervened. After a while I wanted to use the washroom. I was about to enter when I was stopped by one of the teachers that, children are waiting in line, please let them use it first. OK, I knew this line would not end till I could wait, so I took the wise decision to use the lavatory of the other compartment.
In such a huge group of 50 children, you usually find children of all sorts, not so troubling, shy and speechless variety, children whose voice box seems to have been made specially at the Bosch Sound System’s factor, children who are born mountaineers, trying to ride the chairs in the Chair Car compartment, children who were asking for ‘lunch’ right from the moment  they boarded the train (“मैडम आपने तो कहा था कि लंच मिलेगी? कब मिलेगी ?) My seat was right behind their last row. After watching them for almost an hour, I could not resist asking their teacher “ Would you mind if I take photographs of your students?” He permitted me with a smile. I have posted the best of the photographs and some videos that I took. Though I wanted to take photographs of them doing their usual stuff without being conscious of being videographed/photographed, the moment I took the camera to them, they all started being good guys giving nice poses, some of which were really worth applause.
The attendants on trains are found to be serving usually with expressionless long drawn faces. They were found smiling all along. The TTE told me “कान खा गए। इन्हें तो बस लेडिज़ ही संभाल सकती है। ऐसे ही थोड़े ही न कहती हैं, एक दिन सम्भाल के देखो तो समझ में आ जाएगा ।“ co-passengers could not resist a laugh.
Though I was sleep deprived, I could not complain as they had made my journey memorable. 

13/07/2011

आँसू है कि पानी है


इस बार अपनी एक पुरानी रचना जो कि मैंने 28 जून 2004 को लिखी थी। 

सावन में इन आँखों से कुछ ऐसे मोती भी बरसते हैं,
जो उनकी याद में गिरते हैं, जिन से हम मिलने को तरसते हैं,

बादलों के गर्जन में एक आह दब कर रह जाती है,
जब उनसे मिलने की चाहत दिल में इक टीस जगाती है,

अम्बर जब बरस-बरस कर तपती धरती की प्यास बुझाता है,
मुझको भी बार-बार मेरा साक़ी याद आता है
 
काली, लम्बी रातों में जब बिजली से डर छुपता है अन्धेरा दो पल को,
चाहत उठती है, बस दो पल ही सही, वो आएँ, सफल कर जाएं जीवन को।

मेंढक भी जब फुदक-फुदक कर अपने मीत बुलाते हैं
लगता है, हमसे ये मेंढक ही भले, दिल खोल इश्क फ़रमाते हैं ।

भीग रहें हैं पेड़ पौधे, छा गई उन पर भी जवानी है,
भीगे हैं हम जिससे, पता नहीं आँसू है कि पानी है। 

16/06/2011

चौकन्ने रहो


पग पग में है ज़ाल बिछा, ख़तरों से भरी है डगर,
कोइ बहेलिया है इंतज़ार में , सुबह शाम दोपहर।

पीछे खंजर है उनके, जिनके मुँह में मिठी बात है,
बस खिलौने हैं इनके लिए ये जो तुम्हारे ज़ज्बात हैं।

छीन लेंगे आज़ादी, काट कर तुम्हारे पर,
ज्यादा शोर मचाओगे तो कर देंगे अन्दर।

घर में बाज़ार में, हर जगह खतरा ही खतरा है,
तुम्हारी ज़ेब के पीछे लगा हर जगह एक जेबकतरा है।

हर मुस्काते चेहरे के पीछे लालची निग़ाहे हैं,
काँटे छुपे हुए हैं उनमें, हरी भरी जो राहें है।

धन हवस के पुजारी ये, हैवानियत के फ़रिश्ते हैं,
बेमानी हर धर्म इनके लिए, बेमानी हर रिश्ते हैं।




ऐ मासुम कल को लुट ना जाए कही तुम्हारा भोलापन,
 भूल कर भी कभी ना खोना, अपना चौकन्नापन।

11/05/2011

आओ यादों की लहरों में गोते लगाएँ

Father Jose Muthupalakal
  a Synonym for
Discipline, Dedication, Secularism and  

Indian Values.
इससे पहले कि मन के आईने पर, यादों की छवि धुन्धली पड़ जाए;
या फिर उन Great Times की तस्वीरें, आलमारी के सीलन से सड़ जाएँ।

मन हीं मन हजारों गालियाँ दीं थी फादर जोश को,
बीत ना जाए उनके लिए माफी माँगने का अवसर;


या फिर उस दोस्त को बताने का मौका,
जिसकी Tiffin चुरा कर खा जाते थे अक्सर।

दयानन्द सर का Children’s Day पर गाया गया वो पुराना गाना,  
( R D Burman का माँझी वाला)
या फिर Teacher से हमारी शिकायत करने वाला वो दुश्मन पुराना।


अरूण सर के Chemistry Equations की टेढ़ी  पहेली,
या फिर सबसे कट कर रहने वाली वह लड़की अकेली।

विनोद सर के संस्कृत के शब्द रूपों की माला,
या फिर मिस मरियम की कक्षा में पढाए गए दिनकर, निराला।


इन्द्रभूषण सर का बताया हुआ Cell Division,
या सन्दीप सर का बताया छुपी बेरोज़गारी का Definition|

संजय सर की Library में पढे गए किताबों की गिनती,

या फिर मामा की शादी में जाने देने के लिए फादर से की गई विनति,

आओ कैद कर लें उन यादों को इस WA Group के सहारे,
यादों की लहरों में गोते लगाएँ, बैठे ना रहें किनारे।

कि जब भी मन हो भारी,
या छाने लगे सफलता और पैसे की ख़ुमारी,

याद कर लें Fr. Jose की पिटाई,(अभी भी सपनों में पिट्ता हूँ)
और बाँट कर खाई गई Tiffin Box की मिठाई,

और कर लें हिसाब कितना जमा है यादों के बचत खातों में,

जिसे पढ़ कर सूकून की नींद आ जाए परेशानी भरी रातों में।

दिखा सकें अपने जीवन साथी को अपने पहले Innocent Crush की तस्वीर
(Very rare to find a creanite of Fr. Jose’s times to have a crush on someone.)
जो कभी बैठते थे एक Table पर आज कहाँ ले गई उनको तकदीर 

बचपन में जनसंख्या पर भाषण देने वाले सहपाठी के है कितने बच्चे 
(Just Joking, तुकबन्दी only),
या फिर Slam Book में दोस्तों के किए वादे हैं कितने सच्चे 
(Will always be in touch, etc etc)।


दिखा सकें अपने बच्चों को कि हमारा कैसा स्कूल था,
और उसमे पढ़ने वाला तेरा बाप कितना नामाकूल था।

जब ढ़ूढ़ेंगे अपने बच्चों के स्कूलों में क्रेन स्कूल जैसी Quality
और उनके Principals में Fr. Jose जैसी Personality,

तो फिर दिल का बोझ दोस्तों को बताने में यही FB Group काम आएगा,

और हमारे दोस्तों में से कोई हमको समझाएगा,

तू भी नादान है, Fr. Jose जैसा दूसरा नहीं मिलेगा,
जहाँ भी मिले Admission करवा दे, कहाँ कहाँ भटकेगा

10/03/2011

पागल


लोग पुकारें मुझको पागल,
मारे ताने बेवज़ह।
इसमें क्या दोष मेरा,
मुझे तू दिखती हर जगह।

सुख दुख आँख मिचोली खेलते थे,
जब जीता था अपनों में।
अब तो बस सुख ही सुख है,
जब से जीता हूँ तेरे सपनों मे।

लोग ग़म को भुलाते हैं,
शराब के सहारे।
मैं तेरी याद में मदहोश
पड़ा रहता हूँ तेरी गली के किनारे।

कोई मारे पत्थर
कोई गाली दे कर जाता है,
मैने किसी का क्या बिगाड़ा
मुझे समझ नहीं आता है.

मैं चिल्ला चिल्ला कर पुकारू तुझे
तो लोगों को गुस्सा आता है,
उनका पण्डित उनका मुल्ला
माइक पर चिल्ला किसको बुलाता है.

मैं दिखता हूँ गन्दा तो क्या,
मेरा दिल उनसे साफ है,
मेरा हँसना भी है उनको नागवार
उनका धर्म के नाम पर हत्या माफ़ है.

वे क्या जाने प्रेम का मतलब
जिनके लिए शादी व्यापार है,
तुम दुनिया छोड़ गई तो क्या
मुझको तेरी यादों से भी प्यार है.

करता हूँ बस याद तुझे,
और दूजा कोइ काम नहीं,
नहीं पहचानता किसी और को,
तेरे सिवा याद कोई नाम नहीं।

14/01/2011

कर्ज़ गुलामी जारी है


प्रस्तुत कविता की हरेक पंक्ति में एक प्रश्न है, जिसका उत्तर हम सबको मालूम है। भारत की ऐसी परिस्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है? जरा ठहरिये, आप चाहे जो भी नाम लें उन सबमें एक समानता है। वे सभी स्वार्थ, लालच आदि जैसी बिमारियों के शिकार हैं/थे। कया आप इन बिमारियों से ग्रस्त नहीं हैं? तो फिर इस परिस्थिति के लिए आपको भी ज़िम्मेदार क्यों न माना जाए? आत्मचिंतन ज़रूरी है। 

लाल किले पर जो झंडा शान से लहरा रहा है,
जिनका खून है इसके धागे में, याद उनकी दिला रहा है।

आज़ाद भारत में दर्द न होगा, यह सोंच लाठियाँ सह जाते होंगे,
आज़ाद भारत में कोई भूखा नहीं सोएगा, यह सोंच भूख में भी मुस्काते होंगे।

छुप-छुप के जीते होंगे, यह सोंच हम चलेंगे सीना तान,
हमें शान की ज़िन्दगी देने के लिए हँसते-हँसते हो गए कुर्बान।

उन बलिदानियों की आँखों में कुछ ऐसे सपने होंगे,
फिर से चहकेगी सोने की चिड़िया, जब संसद में अपने होंगे।

सुशासन की बयार बहेगी, जब अपने होंगे सरकारी पदों पर,
कोई कलम से विकास गाथा लिखेगा, कोई नज़र रखेगा सरहदों पर।

नहीं होंगे साम्प्रदायिक दंगे, जब फूट डालने वाले चले जाएँगे,
नहीं होगा कोई अगड़ा पिछड़ा, सब कदम से कदम मिलायेंगे।

जिन सपनों के लिए वीरों ने खून से लिखी इबारत,
वो सपने सपने रह गए, बस आज़ाद गो गया भारत।

अज़ाद हुआ अंग्रेजों से पर समस्याओं से आज़ाद हो न सका,
उसका बलिदानी लाडला अब तक चैन से कब्र में सो न सका।

गाँधी, असफाक, सुभाष, भगत सिँह, उनका हम सब पर कर्ज़ है,
उनके अधूरे काम को पूरा करना अब हम सब का फर्ज़ है।



जो खून बहा था सड़कों पर उसमें एक भी कतरा मेरा नहीं था,
जब अमृतसर में बिछ रही थीं लाशें मैं चादर तान सो रहा कहीं था,

जो दे गए हमें आज़ादी उनका कर्ज़ चुकाना होगा,
उनके सपनों का भारत अब जल्द बनाना होगा।

हमें आज़ाद करने को सब कुछ लुटा गए अभागे,
और हम पल में घुटने टेक देते हैं अपने स्वार्थ के आगे।

चोरी घूसखोरी, सीनाज़ोरी जैसे भी अपना काम हो बनता,
अपना फायदा होता रहे, चूल्हे में जाए जनता।

जब तक देश में मौजूद भ्रष्टाचार, भूखमरी, बेकारी है,
घोषित हो स्वाधीन भले हीं, मगर गुलामी ज़ारी है।

आओ अपने स्वार्थों की दे दें आहुति, देश नहीं माँग रहा प्राण,
शहीदों के सपनों का भारत बन जाए हमारा भारत महान।

प्रकाशित: लेखापरीक्षा प्रकाश, जुलाई-सितम्बर 2010.

  

03/01/2011

किराए का मकान

इस बार के चिट्ठे मे पढ़िए एक कहानी: निर्जिव, पराए किराए के मकान से एक स्त्री के भावनात्मक जुड़ाव की। ये कहानी मैंने 2003 में लिखी थी। हँसराज कॉलेज में मुझे जर्मन भाषा पढ़ाने वाली प्रोफेसर प्रतिभा भट्टाचार्जी अपने पुराने सरकारी क्वार्टर्स को छोड़ कर अपने नए मकान में जाने वाली थीं। हमें पढ़ाते पढ़ाते अक्सर भावुक हो उठती थीं। उनकी भावनाओं के उपर तानाबाना बुन कर तैयार की गई है ये काल्पनिक कहानी। इसके सभी पात्र और घटनाएँ कालपनिक हैं एवं उनका जीवित अथवा मृत किसी भी व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। उम्मीद है आपको अच्छी लगेगी।


15 वर्ष पहले जब मैं यहाँ आई थी तब यह घर हमारे लिए अनजान था और हम भी इसके लिए अज़नबी। घर में घुसते हीं लगा मानो हर दरवाजा, हर खिड़की पूछ रहे थे, आप कौन? कई मायनो में उन्होंने भी हमें अपनाने से अपना विरोधा जताया था। कभी खिड़की से चोट तो कभी रसोईघर के छोटे दरवाजे की चोखट से। सीढ़ीयाँ देख देख कर चढ़ते थे और दरवाज़े खिड़कीयों की कुण्डियाँ देख देख कर बन्द करते थे।

पीछे की बगिया में मुरझाए हुए पौधे और फूल अपनी उदासी (पुराने किराएदार के जाने पर) साफ बयान कर रहे थे। पिछले किरायेदार के बच्चे भी थे शायद, जिन्होंने दीवारों पर कुछ फूल पत्तियाँ, तो कहीं जानवरों के चित्र भी बना रखे थे। हालाँकि सारे चित्र पेंसिल या मोम के रंगों से बनाए गए थे पर मुझे वे अच्छे लग रहे थे। जब मेरे पति ने कहा कि महीने दो महीने बाद आने वाली दीपावली के पहले सफेदी करवा कर इन्हें मिटा देंगे तो मन ही मन मुझे अच्छ नहीं लगा था।

घर में आने के पहले दिन हीं गुसलखाने की नाली जाम हो गई। हमें लगा मानो हमारे साथ धोखा हुआ है। क्या यह समस्या हमेशा हीं रहेगी? गुस्से में आकर मेरे पति जब मकान मालिक से शिकायत करने गए तब उसने भी अनभिज्ञता ज़ाहिर की और कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। साफ सफाई करवाने पर जब सारे आफत की जड़ पोलिथिन का एक टुकड़ा बाहर आया तब हमने राहत की साँस ली। अब मुझे शक होता है कि कहीं यह गुसलखाने का हमें अस्वीकार करने के इज़हार का एक तरीका तो नहीं था? हो सकता है।

समय बीतता गया दिनब-दिन कुछ नया होता गया और हर घटना हमें इस घर से और जोड़ती गई। राहुल का जन्म हमारे इसी घर में आने के चार महीने बाद हीं हुआ था। मैं कैसे भूल सकती हूँ वह कोने वाला कमरा जो प्रसव पश्चात बीस दिनों के लिए मेरा आश्रय था। हमारे यहाँ एक प्रथा है कि प्रसूता स्त्री को 20 दिनों तक अलग एक कमरे में काटना पड़ता है। सासू माँ और पिता जी उन्हीं दिनो अपना सारा सामान लेकर हमारे साथ रहने आ गए। मैंने ही बुलवाया था उन्हें, गाँव में रखा भी क्या था। पिता जी के खेत तो इनकी पढ़ाई के लिए बिक गए थे, फिर पिता जी की उम्र भी आराम करने की हो चली थी। गाँव की अपनी दुकान बेच कर जब वे और माँ जी हमारे साथ रहने आ गए तब मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। अब राहुल के पापा के दफ्तर चले जाने के बाद मुझे सुना सुना नहीं लगता था। राहुल के आने के बाद वह खुशी चार गुनी हो गई थी। राहुल के बाद नेहा आई और पूरा घर हर समय दादा दादी और पोते-पोती के कह-कहों से गुंजता रहता था।

समय मानो तेजी से भागता जा रहा था। खुशी के दिन तो वैसे भी जल्दी-जल्दी कटते हैं। पर एक बात तो तय थे कि हर जाता हुआ दिन हमारे आपसी और इस घर से हमारा नाता और गहरा करता जा रहा था। अब सीढ़ीयाँ देख कर चढ़नी नहीं पड़ती थी और खिड़कियाँ दरवाजों की सिटकनियों को तो मानों हाथों ने भी देख लिया था। पड़ोसियों से भी दोस्ती हो गई। चार पाँच सालों में तो ऐसा लगने लगा मानों हम सदा से यहाँ हीं रहते आए थे।

दस साल बीत गए। एक दिन हँसते-बतियाते पिता जी चल बसे। उनके बिना तो यह घर तो बस काटने को दौड़ता था। दिन भर लगता मानो राहुल और नेहा से मज़ाक करने के बाद उनकी हँसी गूँज रही हो। खैर समय ने ये घाव भी भर दिए, पर माँ जी की आँखों में आज भी सूनापन दिखता है। बहुत प्यार करते थे दोनो एक दूसरे से।

करीब तीन साल पहले राहुल के पापा ने एक दिन जब मुझसे कहा कि पास में अपना घर खरीदने लायक पैसे हो गए हैं तब मैं फूले न समाई। अपने घर का सपना जो पूरा होने वाला था। पिता जी कि दूकान के पैसे जो इन्होंने फिक्स्ड डिपोज़िट करवा रखे थे उसके पैसे भी मिलने वाले थे। मिला जुला कर इक अच्छा मकान बनाने  लायक पैसे हो गए थे। मकान के लिए जमीन की खोज़ शुरू हुई। पर यह इतना आसान नहीं था, हाथों में पैसे रहते हुए अच्छी जगह ज़मीन नहीं मिल रही थी। दो साल के बाद यह खोज़ खत्म हुई। कानूनी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद जब मकान बनाने की बारी आई तो हमने ठेकेदारों की सेवाएँ लेने से साफ इनकार कर दिया। हम अपना मकान अपनी पसन्द से अपनी निगरानी में बनवाना चाहते थे।

जिस दिन भूमिपूजन के साथ उस पर पहली ईंट पड़ी उसी दिन मुझे अहसास हुआ कि हमें पुराना मकान छोड़ना पड़ेगा। धीरे-धीरे ये बेचैनी बढ़ती गई। पिछ्ले हफ्ते मैंने कैमरे की फिल्म के दो रोल खरीदे। मैं मानो घर के कोने-कोने को तस्वीर में कैद कर लेना चाहती थी। जब इन्होने देखा कि एक रोल के बाद दूसरा भी मकान पर ही खर्च होने वाला है, तब इन्होंने मुझे टोका और कहा - अब बस भी करो। पर मुझे बुरा नहीं लगा । क्योंकि उनको क्या पता, रोज़ के चौबीस घंटों के मुकाबले उनके तो दस बारह घंटे ही बीतते थे घर पर। उनको समझ में कैसे आती मेरी भावनाएँ ।

आज सुबह सारा सामान खाली कर हम नए आशियाने की तरफ बढ़ चले है। पीछे ऑटो में नेहा, माँ जी और राहुल आ रहे हैं। मैं और ये ट्रक की अगली सीट पर बैठे हैं। मन में हलचल चल रही है। अब शायद दर्द आँसू बन कर बह निकलेगा। अपने आप को रोकना मुश्किल हो रहा है। खैर मायके से ससुराल आते वक्त भी तकलीफ हुई थी पर यह उससे अलग है। उस समय मन को ढाढस बंधा दिया था कि यह सब तो सामाजिक रीत है। पर इस बार बस एक ही ढ़ाढस है कि अब ऐसी जुदाई नहीं झेलनी पड़ेगी। पीछी ट्रक में लदे सामान भी मानो आवाज़ दे दे कर चिल्ला रहे हैं कि हमें भी नहीं जाना है। इन निर्जीवों का तो नाता ज्यादा गहरा होगा मेरे निर्जीव पुराने घर से। और मेरे आँसू बह निकलते हैं।

प्रकाशित: सुबह-जुलाई-सितम्बर 2006
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