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4 जून 2010

तेरी यादें

दिल से तेरी यादें जाती नहीं,
दिल के किस कोने में है उनका आशियाँ?

मैं भूलने कि कोशिश चाहे लाख करूँ,
तेरी यादें साथ जाती हैं, जाता हूँ जहाँ।

ज़िन्दा लाश बना कर छोड़ दिया
इतना तो बता दे मुंसिब मेरा गुनाह क्या?

तु ही तो बस मेरी अपनी थी,
तेरा दिया दर्द किससे करूँ बयाँ?

यूँ अन्धेरे में जो खो जाना था,
क्यूँ थामा था हाथ मेरा इतनी दूर तलक?

ज़माना बीत गया तेरे दीदार को फिर भी,
नाम तेरा लेकर गिरती उठती है क्यूँ पलक?

जान ले ले जुदाई इससे पहले,
बस एक झलक दिखा जा ऐ बेरहम।


वरना तुझको हीं ढूंढेंगे,
अगले कई युगों तक हर जनम ।

वरना तुझको हीं ढूंढेंगे,
अगले कई युगों तक हर जनम ......

प्रकाशित: सुबह संयुक्तांक 2008

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे लगता है वियोगी बनकर आंसू बहाने से अच्छा है कि कोइ नये सिरे से अपनी जिंदगी संवारे। ये हड्डीयों मे घर बसा देने वाला प्रेम बडा खतरनाक होता है ....आदमी सब कुछ भूलकर सिर्फ उसी पर कंसनट्रेट हो जाता है । खैर आपकी रचना सरल ..सहज और गंभीर है ।

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  2. प्रेम वास्तव में खतरनाक होता है । प्रेम में पड़ा इंसान जो कर जाता है, उसे खुद भी अहसास नहीं होता । तभी तो लोग कहते हैं, प्रेम में बड़ी ताकत होती है। तभी तो हमारे देश के क्रांतिकारी भी देश के प्रेम में अपने प्राण न्योछावर कर देते थे। सूफ़ी संत खुदा को महबूब पुकारते है । ज़रूरत है बस सच्चे प्रेम के तलाश की। अपने से और अपनी मह्बूबा से लोग जितना प्रेम करते है, उतना ही यदि अपने देश, इंसानियत या भगवान से कर लें, तो लोग उन्हे तरह तरह के उँची पदवियाँ दे कर पूजने लगते हैं।

    जिस सन्दर्भ में यह कविता है और आपने टिप्पणी लिखी है, उस सन्दर्भ में कहना चाहता हूँ कि यह मेरा वक्तिगत अनुभव नहीं है । प्रेम में खुद को बरबाद कर देने वाले लोगों को श्रद्धा सुमन रूप अर्पित यह कविता प्रेम रोग की गहनता पर प्रकाश डालती है। आँसू बहाना तो कमज़ोरी की निशानी है प्रेम के ताकत की नहीं, पर प्रेमी पागल इतना हीं समझदार होता तो ऐसी बेवफा से दिल ना लगाता।

    प्रेम करो तो सोंच समझ कर करो पर ऐसा ही करो जिसमें मैं का भाव मिट जाए। लौकिक प्रेम के सम्बन्ध मे भी ये बात खरी है ।

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Gautam Kumar

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